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रविवार, 17 जुलाई 2011

सवाल-जवाब प्रतियोगिता भाग दो-- कसाब आतंकी या मेहमान

 कसाब आतंकी या भारतीय मेहमान

मुंबई बोम ब्लास्ट, क्या यह भारतीय ख़ुफ़िया विभाग की चूकहै,  क्या यह "ISI" पाकिस्तान की साजिश है??  या यह भ्रष्ट भारतीय राजनीती  या जन सेवको  (Civil Servants) की लापरवाही है.  
आइये  जानते है इस पर हमारे संस्थापक हरीश सिंहजी की क्या राय है.?

यह प्रश्न सभी भारतवासियों के दिल में खटक रहा है की कसाब के मामले में सरकार सही कर रही है गलत ...

शनिवार, 16 जुलाई 2011

कसाब है क्या !!!

                                                               भारतीय क़ानून व्यवस्था को ऐसा जटिल बना कर छोड़ दिया है कि बड़े से बड़ा अपराधी ( आज कल इस श्रेणी में अधिकाँश राजनैतिक पार्टियां भी शोभा बढ़ाने की हौड़ में जोर आजमाइस कर रही है !) आरामगाह (जिसे हम साधारण नागरिक जेल कहते हैं !) में शान-ओ-शौकत से अपनी सेहत सुधारने में लगा है.उस अपराधी को भली भांति मालुम है कि अनेक अनेक अनेक (जितनी भी बार 'अनेक' लिखो,कम ही पड़ता है !)  लोग उसके लिए दुआ माँगने की कतार में खड़े हैं.

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान विकट परिस्थितियां

वर्तमान समय भारतीय लोकतंत्र का संकर्मण काल  कहा जा सकता है. लोकतंत्र की इस व्यवस्था ने देश को आकंठ भ्रष्टाचार , बेहद गरीबी , बेरोजगारी , मुक्त भोग विलासिता , भोंडे तरीकों से जीने की वासना में डुबो दिया है. कहीं अपनापन , राष्ट्रीयता , सद्भावना नज़र ही नहीं आ रही है. पूरा देश स्वार्थ , लालच , दोगलापन , वीभत्स मानसिकता के चंगुल में फंस गया है. चारों  तरफ  "अपनी" ही लगी हुई है. निकृष्ट आकांक्षाओं की भूख ने सबको मौकापरस्त , खुदगर्ज़ , शैतानी दिमाग से कमाए धन का लोलुप बना दिया.
     अब सोचने की बात यह है कि हम ऐसा क्योंकर सोचने लग गए कि इन दुश्भावनाओं के पीछे हमारा लोकतंत्र जिम्मेदार है ? नहीं , लोकतंत्र जिम्मेदार नहीं बल्कि आज इस तंत्र के जो पहरुए हैं , जो अपने आप को इस देश के भाग्य विधाता समझ बैठें हैं , इन लोगों ने एक ऐसे जाल का निर्माण कर डाला जिसमें हमारा यह पवित्र लोकतंत्र , इसके जनक (हमारी यह भारतीय जनता) फांस दिए गए. आज देश की एक भी ऐसी राजनैतिक पार्टी नहीं है जो अपने व अपने कार्यकर्ताओं को पाक - साफ़ बता सके. सब के सब गन्दे कीचड़ से सने पड़े हैं ,कालिख ही कालिख पोत रखी है , असली चेहरा तो नज़र ही नहीं आ रहा है , सब मुखोटों की ओट  में छिपे देश की निरीह जनता को लोकतंत्र के नाम से ठगने का व्यापार कर रहे हैं.
     आज जन जागरण की आवश्यकता है . महान भारत का इतिहास गवाह है कि इस देश में धर्म - आध्यात्म का ही एक ऐसा बल था जो सम्पूर्ण धरा पर देशप्रेम , ईमानदारी , सुहृदयता, अपनापन , भाई चारा , माता - पिता - गुरु का सम्मान , परिवार - पालन की सात्विकता ,"तंत्र" के प्रति जवाबदेह होने की प्रेरणा प्रदान करता आया है. पहले राज तंत्र था - उसकी अच्छाइयों को भी मान मिलता था तो बुराइयों का विरोध भी होता था . मगर यह विरोध कुल गुरु , धर्म गुरु या ऋषि - मुनियों के सानिध्य में मुखर होता था. भगवान परशुराम , आचार्य चाणक्य इस के सशक्त उदाहरण है.
      परन्तु न जाने क्या समझ कर इस देश को "धर्म निरपेक्ष" शब्द दे दिया गया , मैं समझता हूँ वह समय लोकतंत्र के ऊपर पहला घातक वार था, जिस वक्त यह दूषित निर्णय लिया गया था. फिर तो एक दौर चल पड़ा - आरोपों / आक्षेपों का. जो भी नीति नियामक बात कहे या व्यवहार करें वही "साम्प्रदायिक" . इस साम्प्रदायिक शब्द ने लोकतंत्र की काया पर वार पर वार किये. साधू भगवा पहनता है तो साम्प्रदायिक , मुसलमान सड़क पर नमाज़ पढ़ता है तो साम्प्रदायिक , पाठ्य पुस्तकों में पौराणिक नीति संबंधी विषय जोड़ दे तो साम्प्रदायिक , वन्दे मातरम या भारत माता के जय बोल दे तो साम्प्रदायिक , धार्मिक - आध्यात्मिक वार्ता करें तो.........ऐसा दौर चला कि यह हमारा लोकतंत्र घायल होता ही गया........परन्तु अब इसे दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य यह लोकतंत्र महादेव शिव शम्भू से "अमर कथा" सुन बैठा....अब अमर हो जाने के कारण मर तो सकता नहीं सो बेचारा घायल होता गया , कराहता गया ,रोता गया........आज भी यह क्रम जारी है. सनद रहे - भगवान महेश्वर "लोकतंत्र" के सबसे सटीक व सशक्त उदाहरण है. यही एक ऐसा परिवार है जिसमें शेर , बैल , सांप -बिच्छु , चूहा , मौर सबका समावेश है.सब जानते हैं कि इन सभी प्राणियों में जातीय दुश्मनी है पर फिर भी एक ही परिवार में प्रेम से रह लेते हैं ( अब मेरी इस बात को भी साम्प्रदायिक न कह दें)
       लोक यानि जनता का यह तंत्र मरा नहीं है , मर सकता भी नहीं , अमरता का वरदान जो मिला हुआ है , इस महान तंत्र को स्वस्थ , बलशाली , पोषक , सिरमौर बनाना है तो इस सनातन देश के आध्यात्म को सर्वोच्च शिखर पर स्थापित करना होगा . समस्त धर्म गुरुओं को अपने अपने धर्म की "वास्तविकताओं" को अपने अनुयाइयों के मध्य प्रचारित - प्रसारित (सही -सही - ईमानदारी पूर्वक) करना होगा. ध्यान रहे यह "आध्यात्म" शब्द प्रत्येक धर्म में विद्यमान है , हाँ , हो सकता है कि नाम अलग अलग हो .
     एक बात चेतावनी पूर्वक कहना चाहूँगा - अगर अब भी यह "साम्प्रदायिक" शब्द जीवित रहा तो वह दिन दूर नहीं जब यह कहा जाएगा कि सूरज गर्म धूप और चन्द्रमा शीतलता की रोशनी क्यों दे रहे है , अग्नि जला क्यों रही है , जल प्यास क्यों बुझा रहा है , वायू प्राणों का संचार क्यों कर रहे है.......... ये सब साम्प्रदायिक हैं , हटाओ इनको......
ब्रह्माण्ड में कोई  अणु भी  धर्म निरपेक्ष तो हो ही नहीं सकता , सबके अपने अपने कर्त्तव्य है , जिम्मेदारी है . फिर भला हमारा प्यारा भारत कैसे धर्म निरपेक्ष हो गया !!!! हमें अपनी इस भयंकर भूल को सुधारना ही होगा , फिर देखिये हमारे इस अमर लोकतंत्र के जलवे...............
जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर

दिलचस्प साक्षात्कार ।

(म्यूज़िक- ढें..टें..ने..ण..!!)

आर.जे.(रॅडियो जॉकी।),"  प्यारे दोस्तों, आज हमारे बीच उपस्थित है,
`पुरुष-प्रधान विवाह-विचारधारा` के कट्टर विरोधी, आजीवन कुँवारी, अखिल
भारतीय विवाह विरोधी संगठन की एकमात्र ऍक्टिविस्ट बहन
सुश्री......!!...........,बहन जी, हमारे, `४२० F.M. रेडियो स्टेशन` पर
आपका दिल से स्वागत है ।"

बहन, " धन्यवाद ।"

R.J.-" अच्छा आप पहले ये बताइए कि,आप के `विवाह विरोधी संगठन` में, आज की
डेट में, कितने सदस्य है?"

बहन,(ऊँगलियां गिनते हुए..!!),"ट्रेड सिक्रेट, नो कमेन्ट्स..!!"

R.J.-" दूसरा सवाल, आपकी  पति-विरोधी नज़र से, किसी विवाहित नारी के जीवन
में,अपने पति की क्या क़ीमत होनी चाहिए?"

बहन," ZERO-शून्य-कुछ भी नहीं..!! सारे पति देव उल्लु जैसे ही बुद्धिहीन
होते हैं, इसीलिए तो मैं, हरेक नारी को शादी करने से पहले सौ बार सोचने
की सलाह देती हूँ । नारी मुक्ति ज़ि..दा..बा..द..!!"

R.J. (चिढ़ते हुए )-" क्यों..!! आप किस आधार पर,  `उल्लु` का उप-नाम
देकर, सारे पुरूष पर  इतना बड़ा इल्ज़ाम लगा रही है?"

बहन," सीधी सी बात है..!! पूरा दिन पत्नी की दुनियाभर की बुराईयाँ करने
वाले पति देव को, रात ढलते ही, घने अंधेरे में भी, अपनी पत्नी में,`उल्लु
की भाँति`, दुनियाभर के सद्गुण, नज़र आने लगते हैं?"

R.J.-" पर बहन जी, पत्नी पर भी, ऐसे आरोप लगते ही हैं कि,पति बेचारा पूरा
दिन मेहनत करके रुपया कमाता है और पत्नी, शॉपिंग के बहाने, शॉपिंग-मोल
में जाकर, उसे  फ़िजूल-खर्च कर देती है?"

बहन," फ़िजूल चीज़ो का शॉपिंग करना, सभी पत्नीओं का जन्मसिद्ध अधिकार है,
उस पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता..!!"

R.J.-"ठीक है, अगला प्रश्न । विवाह-विरोधी संगठन गठित करने की प्रेरणा,आप
को  कहाँ से मिली?"

बहन," मेरे घर में, मेरी माता जी से..!!"

R.J.-" आप की माता जी, शादीशुदा थीं?

बहन,(गुस्सा होकर)" कौन से शास्त्र में लिखा है, एक स्त्री ग़लती करें
तो, दूसरी स्त्री को भी, उस ग़लती को दोहराना चाहिए?"

R.J.-" समझ गया..!! अच्छा बहन, आप के किसी प्रशंसक पुरूष का कॉल है, क्या
आप उनके प्रश्न का जवाब देना चाहेंगी? महाशय, ज़रा आपका नाम और प्रश्न
बतायेंगे?"

कॉलर पुरूष," मेरा नाम.....है । मैं आपका एक्स प्रेमी हूँ और आज भी आपसे
बहुत प्रेम करता हूँ, मुझे पहचाना? मैं,....करोड़पति श्री....., का
इकलौता बेटा? आपके साथ कॉलेज में? बहुत साल पहले ? मैंने आपको, एक प्रेम
पत्र भेजा था..!! मैंने अभी तक शादी नहीं की..!! क्या  आप मुझ से लीव-इन-
रिलेशनशिप बनाएगी?"

बहन," अ...बे, सा..आ..ल्ले..!! इतने साल,  मुझे छोड़ कर, कहाँ ग़ायब हो
गया था?  मैं तुमसे, अभी और इसी वक़्त मिलना चाहती हूँ..!! इस वक़्त तुम
कहाँ हो?"

कॉलर," डार्लिंग,मैं इस वक़्त, तेरा रेडियो प्रोग्राम ख़त्म होने की
प्रतीक्षा में, रेडियो स्टेशन के बाहर ही खड़ा  हूँ..!!"

बहन," य..स, य..स, स्टे धेर, आय एम जस्ट कमिंग..!! मैं तुम से अभी, इसी
वक़्त, शादी करना चाहती हूँ..!!"

R.J.-(हैरानगी जताते हुए)" पर, बहन जी, अपने आज के इस रोचक साक्षात्कार
का क्या होगा? और फिर आप के विवाह विरोधी आंदोलन का क्या होगा? आप के
उकसाने पर, आप के संगठन से जुड़ी हुई, बाकी महिला सदस्यों का भविष्य क्या
होगा?"

बहन," नॉ कमेन्ट्स..!! ये ले तेरा माइक..!! मैं तो चली, मेरे डार्लिंग के
पास..!! बा..य,बा..य?"

आधुनिक बोध-   अपने किसी निर्णय पर, बहने, सदा अटल रहती है, ऐसा मानने की
भूल, किसी पुरूष को हरगिज़ नहीं करनी चाहिए..!!

मार्कण्ड दवे । दिनांक-०४-०७-२०११.

रविवार, 3 जुलाई 2011

लोकपाल के ताबूत में एक और दरार |


परिस्थितियों के दबाव के बावजूद सरकार देश में स्वतंत्र भ्रष्टाचार विरोधी संस्था का गठन करने में भयभीत क्यों दिखाई पड़ रही है? वह क्यों सोचती है कि ऐसा कोई संगठन समानांतर सरकार का स्वरूप धारण कर लेगा?

ऐसा लगता है कि देश ऐसे लोगों से भर गया है जो न केवल दब्बू हैं और खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं, बल्कि उनमें दूसरों के प्रति विश्वास की भी भारी कमी है। प्रशासन अपने जन सेवा के कर्तव्यों को सुधारवादी रवैये के साथ पूरा करने के बजाय पूरी तरह कारोबारी हो गया है।

इसका प्रमुख कारण जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार है। इसे सहन करके या इसे बढ़ावा देकर किसी न किसी रूप में हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं।

सभी स्तरों पर भ्रष्टाचार को रोकने एवं उसे दंडित करने के लिए देश को इस समय एक व्यापक एवं कारगर सिस्टम की दरकार है। जनप्रतिनिधियों एवं मतदाता के बीच की बढ़ती खाई सोचनीय है। लेकिन जैसे ही चुनाव नजदीक आते हैं, वोट के भिखारी उसी सिविल सोसायटी के पास हाथ जोड़े दुबारा समर्थन मांगने पहुंच जाते हैं जिसे चुने जाने के बाद ये कहना शुरू कर देते हैं कि सिविल सोसायटी को उनसे कुछ पूछने का अधिकार ही क्या है? ये सिविल सोसायटी वाले होते कौन हैं?

मतदाता अब बदल रहे हैं। मीडिया और प्रौद्योगिकी के प्रति हमें शुक्रगुजार होना चाहिए कि वोटर अब अधिक जागरूक है। लोग अब उन तकलीफों का अंत चाहते हैं जो लंबे समय से उन्हें परेशान किए हुए हैं और उनके सपनों के पूरा होने में बाधक हैं।

अब वे अलग- थलग रहने के बजाय चाहते हैं कि उनकी बातें सुनी जाएं। समाज और शासन के मध्य विश्वास की भारी कमी है। लोग लाचार होकर अपने प्रतिनिधियों को भ्रष्टाचार में लिप्त देखते रहते हैं और उन्हीं की कीमत पर वे दुबारा चुन कर आ जाते हैं। किसी कैंडिडेट को रिजेक्ट करने का अधिकार न होने के कारण वोटर शैतान और समुद्र में से किसी एक को चुनने को मजबूर है।

लोगों ने अन्ना हजारे के नेतृत्व में एक स्वतंत्र भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकरण के गठन के लिए इसलिए आंदोलन किया कि राष्ट्रीय संसाधनों के निर्लज्ज दोहन वाले एक के बाद एक घोटाले सामने आए और सरकार ने उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की। चाहे इसे मानवीय इच्छा शक्ति की कमी मानें या ढांचागत अभाव, सरकारी मशीनरी हर मामले में विफल साबित हुई है।

बाहरी और भीतरी दबावों के बाद सरकार 42 साल पुराने 'लंबित' लोकपाल बिल की झाड़पोंछ करने को तैयार हुई। बड़ी मजबूरी में सरकार एक कमजोर लोकपाल विधेयक के मसौदे के साथ सामने आई। यह भी उसने तब किया जब सिविल सोसायटी हस्तक्षेप करते हुए भ्रष्टाचार की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए एक व्यापक और कारगर भ्रष्टाचार विरोधी ड्राफ्ट के साथ आगे आई। आगे की कहानी लोगों को मालूम है।

अन्ना हजारे की टीम के पांच सदस्यों और पांच सरकारी सदस्यों की बैठकों के बाद दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण सामने आए। सरकारी मसौदा इस देश के लोगों के साथ एक छलावा है। यह भ्रामक है और मुद्दों को उलझाने वाला है। जरा गौर फरमाएं तो इस तथ्य की पुष्टि इन प्रमुख मतभेदों से हो जाती है।

चयन समिति: सिविल सोसायटी द्वारा प्रस्तावित बिल में दो चुने हुए राजनीतिज्ञ, चार सेवारत न्यायाधीश एवं दो स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरणों को शामिल करने पर बल दिया गया है। दूसरी ओर मंत्रियों की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव में छह चुने हुए राजनेता (जिनमें से पांच सत्तारूढ़ दल और एक विपक्ष से), दो सेवारत जज और दो सरकारी अधिकारी।

यह पहला बड़ा अंतर है। इस प्रकार एक ओर 'सत्ता में बैठी सरकार' के प्रभुत्व वाला पैनल है और दूसरी ओर जन लोकपाल बिल में प्रस्तावित संतुलित पैनल है।

दूसरा प्रमुख मतभेद पड़ताल समिति को लेकर है। इस समिति पर देश में उपलब्ध प्रतिभावान लोगों को शामिल करते हुए पारदर्शी तरीके से देशव्यापी पड़ताल एवं समन्वय की जिम्मेदारी होगी। सिविल सोसायटी ने दस सदस्यीय समिति का प्रस्ताव किया जिसमें पांच भूतपूर्व सदस्य उच्च न्यायपालिका से, अवकाश प्राप्त नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक एवं मुख्य चुनाव आयुक्त एवं पांच सदस्य सिविल सोसायटी से लिए जाएंगे।

इससे देश के गणमान्य लोगों भ्रष्टाचार से निपटने में अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा। सरकारी प्रस्ताव में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। वह कुल मिलाकर सरकारी संरक्षण का मोहताज है।

सरकारी बिल में तीसरा एवं गंभीर मतभेद पूछताछ एवं जांच के बाद सभी स्तरों पर अभियुक्त की 'इच्छा' एवं 'व्यक्तिगत सुनवाई' के प्रावधान को लेकर है। इससे मुकदमेबाजी और विलंब का रास्ता खुलेगा। उदाहरण के तौर पर: पूछताछ > लोकपाल से शिकायत > अभियुक्त की सुनवाई > जांच और अंतिम चार्जशीट से पूर्व एक और सुनवाई। यहां तक कि किसी व्यक्ति के अप्रत्यक्ष मामले में भी यदि उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती हो तो उसे भी समान अवसर दिया जाना चाहिए।

सिविल सोसायटी के ड्राफ्ट बिल में प्रारंभिक जांच के बाद अभियुक्त को कानून के मुताबिक पूछताछ एवं जांच के लिए संबद्ध कर दिया जाएगा, उसके बचाव को साझा करने के लिए कोई पूर्व सुनवाई नहीं की जाएगी। उसे कानून के अनुसार अपना बचाव अदालत में करना होगा।

इसके अलावा दोनों मसौदों में इस बात को लेकर भी भारी अंतर है कि सरकारी मसौदे में नौकरशाही के संयुक्त सचिव स्तर से नीचे के तबकों को शामिल नहीं किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि आम आदमी अपने रोजमर्रा के कामों के निपटारे के लिए जिन अधिकारियों से रूबरू होता है, वह पूरी तरह उनके रहमोकरम पर निर्भर होगा।

सरकारी बिल में सिटीजन चार्टर के प्रावधान में समय पर काम न करने वाले अधिकारियों को दंडित करने का कोई उल्लेख नहीं है जबकि सिविल सोसायटी के मसौदे में इसकी व्यवस्था की गई है। इस खामी से यह संदेश जाता है कि भ्रष्टाचार केवल कॉर्पोरेट है और घूस बहुत 'मामूली' चीज है जिसके साथ आम आदमी को जीना ही है।

गंभीर चिंता का एक विषय यह भी है कि सरकारी मसौदे में लोकपाल एक अन्य एकाकी संस्था है। न तो उसे केंद्रीय सतर्कता आयोग दिया गया है और न ही सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा उसके सुपुर्द की गई है, जबकि लोकपाल का काम जांच करना ही है।

लोकपाल को किसी लंबित जांच के मामले से खास तौर से दूर रखा गया है। अत: भ्रष्टाचार के वे सभी पुराने मामले, यदि उनकी जांच हो रही हो तो वे लोकपाल के अधिकार क्षेत्र से दूर रहेंगे।

यदि इस किस्म का लोकपाल आता है तो वह कानून लागू करने वाली मशीनरी की एक बेकार तीली के अलावा कुछ नहीं होगा और वह मौजूदा खामियों को बढ़ाने वाला ही साबित होगा। वह भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र को मजबूत करने के बजाय उसे और पंगु बनाएगा। इसके अलावा, इस बात का निर्णय कौन करेगा कि कौन सा मुद्दा किसे सौंपा जाए? प्रधानमंत्री जी, क्या समाधान के बजाय संघर्ष करना ही हमारी नियति है?

--

दर्द होता रहा छटपटाते रहे

“दर्द होता रहा छटपटाते रहे, आईने॒से सदा चोट खाते रहे, वो वतन बेचकर मुस्कुराते रहे
हम वतन के लिए॒सिर कटाते रहे”
 Anna_Hazare-300x235.jpg

280
लाख करोड़ का सवाल है ...
भारतीय
गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा"* ये कहना है स्विस बैंक के
डाइरेक्टर
का. स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह
भी
कहा है कि भारत का लगभग 280
लाख
करोड़
रुपये
उनके स्विस
बैंक
में जमा है. ये रकम
इतनी
है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट
बिना
टैक्स के
बनाया
जा सकता
है
.
या
यूँ कहें कि 60 करोड़
रोजगार
के अवसर
दिए
जा सकते है. या यूँ भी कह सकते है
कि
भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4
लेन
रोड बनाया
जा
सकता है. ऐसा भी कह
सकते
है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है. ये
रकम
इतनी
ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो 60
साल
तक ख़त्म ना हो. यानी भारत को किसी वर्ल्ड बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत
नहीं
है. जरा सोचिये ... हमारे भ्रष्ट राजनेताओं
और
नोकरशाहों ने
कैसे
देश को

लूटा
है और ये लूट का सिलसिला अभी तक 2011 तक जारी है.
इस
सिलसिले को
अब
रोकना

बहुत
ज्यादा जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज
करके
करीब 1 लाख
करोड़
रुपये लूटा. मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रस्टाचार ने 280
लाख
करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64
सालों
में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने
करीब
36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा स्विस बैंक में इन भ्रष्ट
लोगों
द्वारा जमा
करवाई
गई है. भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है. सोचो की
कितना
पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके
रखा
हुआ
है
. हमे भ्रस्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार
है
.हाल ही में हुवे घोटालों का
आप
सभी को पता ही है - CWG घोटाला, २ जी
स्पेक्ट्रुम
घोटाला , आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन
से
घोटाले
अभी
उजागर होने वाले है ........आप लोग जोक्स फॉरवर्ड करते ही हो. इसे भी इतना
फॉरवर्ड
करो की पूरा भारत
इसे
पढ़े ... और एक आन्दोलन बन जाये

--
Rajeev Mohan Saxena



--
Biranchi N.P. Panda
Ph.no-  9953079450 (M)
           bnppanda@yahoo.com

मृत्यु पत्र - अमर बलिदानी वीर नाथूराम गोडसे

प्रिय बन्धो चि. दत्तात्रय वि. गोडसे
मेरे बीमा के रूपिया आ जायेंगे तो उस रूपिया का विनियोग अपने परिवार के लिए करना । रूपिया 2000 आपके पत्नी के नाम पर , रूपिया 3000 चि. गोपाल की धर्मपत्नी के नाम पर और रूपिया 2000 आपके नाम पर । इस तरह से बीमा के कागजों पर मैंने रूपिया मेरी मृत्यु के बाद मिलने के लिए लिखा है ।
मेरी उत्तरक्रिया करने का अधिकार अगर आपकों मिलेगा तो आप अपनी इच्छा से किसी तरह से भी उस कार्य को सम्पन्न करना । लेकिन मेरी एक ही विशेष इच्छा यही लिखता हूँ ।
अपने भारतवर्ष की सीमा रेखा सिंधु नदी है जिसके किनारों पर वेदों की रचना प्राचीन द्रष्टाओं ने की है ।
वह सिंधुनदी जिस शुभ दिन में फिर भारतवर्ष के ध्वज की छाया में स्वच्छंदता से बहती रहेगी उन दिनों में मेरी अस्थि या रक्षा का कुछ छोटा सा हिस्सा उस सिंधु नदी में बहा दिया जाएँ ।
मेरी यह इच्छा सत्यसृष्टि में आने के लिए शायद ओर भी एक दो पीढियों ( Generations ) का समय लग जाय तो भी चिन्ता नहीं । उस दिन तक वह अवशेष वैसे ही रखो । और आपके जीवन में वह शुभ दिन न आया तो आपके वारिशों को ये मेरी अन्तिम इच्छा बतलाते जाना । अगर मेरा न्यायालीन वक्तव्य को सरकार कभी बन्धमुक्त करेगी तो उसके प्रकाशन का अधिकार भी मैं आपको दे रहा हूँ ।
मैंने 101 रूपिया आपकों आज दिये है जो आप सौराष्ट्र सोमनाथ मन्दिर पुनरोद्धार हो रहा है उसके कलश के कार्य के लिए भेज देना ।
वास्तव में मेरे जीवन का अन्त उसी समय हो गया था जब मैंने गांधी पर गोली चलायी थी । उसके पश्चात मानो मैं समाधि में हूँ और अनासक्त जीवन बिता रहा हूँ । मैं मानता हूँ कि गांधी जी ने देश के लिए बहुत कष्ट उठाएँ , जिसके लिए मैं उनकी सेवा के प्रति और उनके प्रति नतमस्तक हूँ , किन्तु देश के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि का विभाजन करने का अधिकार नहीं था ।
मैं किसी प्रकार की दया नहीं चाहता और नहीं चाहता हूँ कि मेरी ओर से कोई दया की याचना करें । अपने देश के प्रति भक्ति-भाव रखना अगर पाप है तो मैं स्वीकार करता हूँ कि वह पाप मैंने किया है । अगर वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य पर मेरा नम्र अधिकार है । मुझे विश्वास है की मनुष्यों के द्वारा स्थापित न्यायालय से ऊपर कोई न्यायालय हो तो उसमें मेरे कार्य को अपराध नहीं समझा जायेगा । मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह कार्य किया है । मैंने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीतियों के कारण हिन्दुओं पर घोर संकट आये और हिन्दू नष्ट हुए । मेरा विश्वास अडिग है कि मेरा कार्य ' नीति की दृष्टि ' से पूर्णतया उचित है । मुझे इस बात में लेशमात्र भी सन्देह नहीं की भविष्य में किसी समय सच्चे इतिहासकार इतिहास लिखेंगे तो वे मेरे कार्य को उचित ठहराएंगे ।
कुरूक्षेत्र और पानीपत की पावन भूमि से चलकर आने वाली हवा में अन्तिम श्वास लेता हूँ । पंजाब गुरू गोविंद की कर्मभूमि है । भगत सिंह , राजगुरू और सुखदेव यहाँ बलिदान हुए । लाला हरदयाल तथा भाई परमानंद इन त्यागमूर्तियों को इसी प्रांत ने जन्म दिया ।
उसी पंजाब की पवित्र भूमि पर मैं अपना शरीर रखता हूँ । मुझे इस बात का संतोष है । खण्डित भारत का अखण्ड भारत होगा उसी दिन खण्डित पंजाब का भी पहले जैसा पूर्ण पंजाब होगा । यह शीघ्र हो यही अंतिम इच्छा !

आपका
नाथूराम वि. गोडसे
14 - 11 - 49

BY: Vishvjeet singh 

इस पोस्ट पर आशुतोष का कथन.......
गाँधी से कोई व्यक्तिगत खुन्नस नहीं थी नाथूराम की..न ही कोई महत्त्वाकांक्षा थी इस वीर अमर हुतात्मा की..
गाँधी जी  ने देश की आजदी में योगदान दिया ये कोई नहीं झुठला सकता मगर पाकिस्तान प्रेम ,नेहरु प्रेम.देश विभाजन ,हिन्दुओं का अहित जाने अनजाने में इसकी जिम्मेदारी भी उनकी ही होती है...ये गाँधी का ही नेहरु प्रेम था जिसके कारन देश विभाजन हुआ और लाखो हिन्दू मारे गए...
अगर राष्ट्रपिता को देश आजाद कराने के लिए नमन हम करते हैं तो देश विभाजन और हिन्दुओं के विनाश की जिम्मेदारी के लिए भी वही राष्ट्रपिता याद आयेंगे... न की इतिहास की भूलो की जिम्मेदारी तय करने  के लिए हम नए राष्ट्रपिता को ढूढेंगे..
कहा भी जाता है की गाँधी के शारीर को नाथूराम ने मारा मगर नेहरु और उनके वंशज गाँधी की आत्मा को आज भी चीथड़े चीथड़े कर के राजघाट से लेकर इटली और स्विस तक बेचने में लगे हैं..
अच्छा हुआ गाँधी जी को नाथूराम ने मोक्ष दे दिया....नाथूराम के लिए बस चार पंक्तिया कहूँगा 

ऐ वीर तुझे है नमन मेरा
तुम राम कृष्ण की हो संतान
गाँधी को तुने दिया मोक्ष
ये याद रखेगा हिन्दुस्थान
..

हुतात्मा नाथूराम अमर रहें


शनिवार, 2 जुलाई 2011

देश का एकमात्र खुशहाल परिवार


कुछ महत्वपूर्ण सन्देश

१) १५ लाख करोड़ रुपये स्विस बैंकों से निकाल कर अन्यत्र छुपा दिए गए है.
२) चीन ने अपनी स्वयं की व्यवस्था से सिर्फ ४ सालों में ४३ किलोमीटर लंबा समुद्री पुल बना कर विश्व की सबसे तेज़ रफ़्तार की रेल चला दी, देखा चीनियों में "स्वदेसी" होने का गर्व !
३) हजारों देश भक्तों ने अपना बलिदान देकर अंग्रेजों से वतन को मुक्त कराया, आज कुछेक गद्दार फिर गुलाम बनाने को आतुर है !
४) अंग्रेज तो हमारा ४०० लाख लूटने में सैंकड़ों सालों तक डटे रहे पर हमारे अपने इन अंग्रेजों ने तो ६० सालों में ही हमें बर्बाद कर दिया , फिर भी ..........
५) कृपया मुलायम चमड़ें से बनी वस्तुओं यथा पर्श,जूते,बेल्ट आदि का बहिस्कार करें क्योंकि ये गाय माता की दुर्दशा की निशानी है.
६) क्या आपको मालूम है कि "लिपस्टिक"में छिपकली,गाय,सूअर आदि का खून इस्तेमाल होता है !   
जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर
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