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सोमवार, 1 अगस्त 2011

लाखों महिलाओं के कंधे पर टिका करोड़ों का व्यापार है पर फिर भी महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में कोई सुधार नहीं,




छो…छोको भूंजी लोक पतर तुड़ले लागसी भोक….” ( हम लोग गरीब भुंजिया आदिवासी, पत्ता तोड़ते हुए भूख लगती है ) नुआपाडा जिले के सीनापाली गांव में रहने वाली 55 वर्षीय पहनी मांझी को जंगल में तेदूपत्ता तोड़ते हुए जब भूख लगती है तो वो अपना ध्यान बंटाने के लिए यहीं उड़ीया लोकगीत गुनगुनाती हैं.


अप्रैल और मई महीने की चिलचिलाती धूप में जब हम अपने वातानुकुलित कमरे में बैठे आराम फरमा रहे होते हैं, उस समय इस इलाके की महिलाएं और बच्चे जंगल-जंगल भटक कर तेंदूपत्ता तोड़ रहे होते हैं. यह पत्ता ही है, जिसे बेचने के बाद उनके घरों में चुल्हा जल पाता है.




अप्रैल और मई महीने की चिलचिलाती धूप में जब हम अपने वातानुकुलित कमरे में बैठे आराम फरमा रहे होते हैं, उस समय इस इलाके की महिलाएं और बच्चे जंगल-जंगल भटक कर तेंदूपत्ता तोड़ रहे होते हैं. यह पत्ता ही है, जिसे बेचने के बाद उनके घरों में चुल्हा जल पाता है.
‘‘मेरे दोनों बेटे और बहुएं काम की तलाश में आंध्रप्रदेश चले गये हैं. यहां मैं और मेरे अंधे पति गांव में रहते हैं. पेट पालने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा. इन दिनों तेंदूपत्ता तोड़कर हम अपना गुजारा करते हैं. तेंदूपत्ता तोड़ना इतना आसान काम नहीं है. जंगल-जंगल भटककर भूखे-प्यासे रहकर धूप में पत्ता तोड़कर लाना पड़ता है. पर परिश्रम के मुकाबले पैसा बहुत ही कम मिलता है.’’ दुखी होकर पहनी हमें समझाती हैं.
वैज्ञानिक तौर पर डायोसपायरस मेलेनोक्ज़ायलोन के नाम से पहचाने जाने वाले तेंदूपत्ता या केंदूपत्ता को बीड़ी पत्ता के नाम से भी जाना जाता है, जिसका इस्तेमाल बीड़ी बनाने के लिये किया जाता है. इस पत्ते को ओड़ीसा में ‘हरा सोना’ कहा जाता है लेकिन यह हरा सोना केवल बीड़ी पत्ता के व्यापारियों और अपने लिये अधिक से अधिक सुविधायें इकट्ठी करने वाली सरकारी महकमे के लोगों की जिंदगी ही खुशहाल कर रही है. इस पत्ते को इकट्ठा करने वालों की जिंदगी तो सूखे हुये बीड़ी पत्ते की ही तरह है- बेजान. गरमी के दिनों में जब खेती के काम लगभग नहीं के बराबर रह जाते हैं तब ओड़ीसा के अनेक गांवों के लाखों गरीब लोग तेंदूपत्ता तोड़कर अपनी रोज-रोटी का जुगाड़ करते हैं.
गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और बदहाल जिंदगी से परेशान कोरापुट, बोलांगीर और कालाहांडी इलाके के लाखों लोग इन दिनों तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए निकलते हैं. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद इन्हें एक दिन की मजदूरी से भी कम पैसा मिलता है.
मजबूरी
यह गौरतलब है कि हमेशा से अपनी गरीबी और भूखमरी के लिये चर्चित इन इलाकों में सर्वाधिक उच्च श्रेणी का तेंदूपत्ता मिलता है. इस इलाके के गांवों में ज्यादातर गरीब, भूमिहीन,खेत मजदूर या फिर छोटे किसान रहते हैं. सरकार की सिंचाई योजना यहां सिर्फ 20 प्रतिशत ही पहुंची हैं. इसलिए यहां के गरीब किसान और उनकी खेती बारिश देवता की कृपा पर निर्भर करती है.

यहीं वजह है कि हर दूसरे साल यहां सूखा पड़ता है. सरकारी काम यहां न के बराबर है. भूख और गरीबी की मार झेल रहे, ये गरीब मजदूर और किसान, काम की तलाश में हर साल लाखों की तादात में प्रवासी मजदूर के रूप में दूसरे राज्यों को चले जाते हैं.
खप्राखोल गांव के एक बुजुर्ग हेमंत माझी बताते हैं ‘‘यहां सरकारी काम नहीं मिलता, किसानों के पास भी अधिक जमीन नहीं है. जो कुछ थोड़ा-बहुत है, उसमें खेती के समय परिवार के लोग ही काम कर लेते हैं. मजदूरों की जरूरत नहीं पड़ती. इसलिए यहां के लोग बनजात द्रव्य जैसे कि महुआ, टोल और तेंदूपत्ता का सहारा लेते हैं. फरवरी और मार्च में हम महुआ इकटृठा करके बेचते हैं और अप्रैल और मई में तेंदूपत्ता तोड़कर सरकार को बेचते हैं.’’
इस इलाके के समाजसेवी रवींद्र जोशी सरकारी व्यवस्था से खफा है. उनका कहना है ‘‘यहां के अधिकांश लोगों के पास जॉबकार्ड तो हैं पर सिर्फ दस प्रतिशत लोगों को 100 दिन का काम मिल पाया है.’’
अगर हम नुआपाडा जिले के महगा गांव की बात करें तो यहां करीब 300 परिवार रहते हैं, जिनमें से नब्बे प्रतिशत भूमिहीन, कृषि मजदूर और छोटे किसान है. इनमें से पचास प्रतिशत लोगों को अभी तक जॉबकार्ड नहीं मिला है और जिनके पास कार्ड है उन्हें दो साल से कोई काम ही नहीं मिला. ऐसी हालत में ये सभी लोग इस महीने में तेंदूपत्ता न तोड़े तो क्या करें ?
नुआपाडा के बोडेन ब्लाक के 55 वर्षीय राधानाथ राउत एक किसान हैं, जिनके पास एक एकड़ जमीन है. सिंचाई की सुविधा न होने के कारण और बारिश की कमी की वजह से पिछले दो सालों से इनकी फसल अच्छी नहीं हो रही है. जो कुछ जमीन से मिलता है उसमें इनके दस सदस्यों का परिवार मुश्किल से गुजारा करता है. फरवरी और मार्च में जंगल से महुआ इकटृठा करके दो हजार और अप्रैल और मई में तेंदूपत्ता तोड़कर 1500 से 2000 रुपए तक कमा लेते हैं. वे कहते हैं ‘‘मेरे दो बेटों ने पिछले साल मनरेगा में काम किया था पर आठ महीने हो गये, अभी तक पैसा नहीं मिला.’’
लड़कियां, औरतें और बच्चे
ओड़ीसा में तेंदूपत्ता एक लाभदायक व्यवसाय है. भारत में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बाद सर्वाधिक तेंदूपत्ता उत्पादन ओड़ीसा में ही होता है. तेंदूपत्ता का संग्रहण इसमें सरकार का निवेश न के बराबर है. ओड़ीसा के बोलांगीर, संबलपुर, कालाहांडी, कोरापुट, अनुगुल, ढेंकानाल, सुंदरगढ़, क्योंझर और कंधमाल जिले में तेंदूपत्ता मिलता है. तेंदूपत्ता का व्यापार लाखों श्रम दिवस पैदा करता है. इस तेंदूपत्ते के व्यापार में सबसे ज्यादा गांव की महिला और बच्चों की भागीदारी रहती है.

फरवरी और मार्च में तेंदूपत्ता के पौधों की कटिंग का काम होता है और अप्रैल और मई में गांव के लोगों को तेंदूपत्ता तोड़ने के लिये कहा जाता है. ये कार्य राज्य के वन विभाग की देखरेख में चलता है. पहले महिलाएं पत्ता तोड़ कर घर लाती हैं, फिर पत्तों का गटृठा बनाती है. प्रोसेस एरिया में 20 पत्ते का एक गटृठा बनता है जबकि फाल एरिया में 40 पत्ते का. प्रोसेस एरिया में एक गटृठा का मूल्य 35 पैसे है जबकि फाल एरिया में 70 पैसे यानि एक पत्ते का मूल्य दो पैसे से भी कम होता है.



राज्य के वन विभाग द्वारा संचालित इस काम में अभी करीब 8000 फड़ी ( जहां पत्ता इकट्ठा किया जाता है ) काम कर रही हैं. सरकारी आंकड़े के हिसाब से साल में लगभग 4.5 लाख क्विंटल तेंदूपत्ता उत्पादन होता है. वर्ष 1973 में इस तेंदूपत्ता का ये सोचकर राष्ट्रीयकरण किया गया था कि तेंदूपत्ता तोड़ने वाले मजदूरों को उचित मूल्य मिले और व्यापार में भी बढ़ोत्तरी हो. लेकिन मजदूरों की हालत अपनी कहानी खुद ही कह जाते हैं. नियमानुसार इस व्यापार में हुए लाभ का 50 प्रतिशत तेंदूपत्ता ग्रांट के रूप में पंचायत के माध्यम से क्षेत्र के विकास के लिए जाना चाहिये, लेकिन इसका भी हाल बुरा है. 2006 में लागू वन अधिकार कानून के तहत तेंदूपता का मालिकाना हक तेंदूपता तोड़ने वालों को सौंपा गया है, लेकिन हकीकत में अब तक यह कानून लागू नहीं हो पाया है.
2009 में सरकार ने 4.41 लाख क्विंटल तेंदूपत्ते को 326.63 करोड़ में बेचा, जिसमें सरकारी खर्च सिर्फ 141.14 करोड़ रुपया आया. इसी तरह 2010 में 362.04 करोड़ का तेंदूपत्ता बेचा गया और खर्च 159.11 करोड़ हुआ यानी 202.93 करोड़ रुपए का लाभ हुआ है. लेकिन इतने लाभ के बाद भी तेंदूपत्ते के काम में लगे मजदूरों, खासकर महिलाओं के हिस्से में केवल शोषण के ही अंतहीन किस्से हैं.
30 साल की सुभद्रा माझी, सीनापाली गांव में अपने पति और दो छोटे—छोटे बच्चों के साथ रहती हैं. छोटा बेटा मोनू अभी सिर्फ छह महीने का है. सुभद्रा हर दिन सवेरे साढ़े चार बजे उठकर पांच बजे तक अपने छोटे बेटे को गोद में लेकर पत्ता तोड़ने के लिए जंगल की ओर निकल जाती हैं. कड़ी धूप में भूखे—प्यासे करीब दोपहर तक पत्ता तोड़ने के बाद घर लौटती हैं.
घर आकर रात का पकाया हुआ खाना अपने परिवार को खिलाकर, वह फिर से शाम पांच बजे तक इकट्ठे किये गये पत्तों का गट्ठा बनाने में लग जाती है. उसके बाद गटृठों को फड़ी में देकर घर लौटते—लौटते शाम हो जाती है. घर आकर फिर से रात और दूसरे दिन दोपहर का खाना बनाती हैं. ‘‘इतनी मेहनत के बाद मुझे होश नहीं रहता कि कब रात होती है कब सवेरा. क्या करें, गरीब हूं और फिर औरत हूं तो इतनी परेशानी तो हिस्से आयेगी ही न ?”
हम मर्द हैं
अपनी पीड़ा छिपाती हुई सुभद्रा बताती है ‘‘मेहनत के मुकाबले पैसा तो बहुत कम मिलता है, सरकार चप्पल देने का वादा की थी पर दो साल के बाद एक बार चप्पल मिलती है. बड़ी दुख भरी होती है हमारी जिंदगी.’’

लेकिन यह कहानी अकेले सुभद्रा भर की नहीं है. इस इलाके में तेंदूपत्त संग्रहण में लगी अधिकांश महिलाओं की हालत ऐसी ही है. जब मैंने उनसे पूछा कि यहां पत्ता तोड़ने का काम सिर्फ महिलाएं ही क्यों करती है, जबकि वहां पर उनके पति तो काम धंधा न होने के कारण इन दिनों घ्रर में ही बैठे रहते हैं. इसका जवाब देते हुए सुभद्रा के पति तथा इस गांव के दूसरे मर्द कहते हैं. ‘‘ये औरतों का काम हैं, जैसे पानी भरना, खाना बनाना, उनका काम है, पत्ता तोड़ना भी उन्हीं का काम है.’’
इस इलाके के हेड चेकर मिनकिंतन का कहना है कि ‘‘पत्ता तोड़ना बहुत कठिन काम है. बड़े धैर्य के साथ एक-एक पत्ता गरमी की कड़ी धूप में चुनकर लाना… बड़ा मुश्किल काम है. पुरुष शायद इससे बचना चाहते हैं. ‘’
सरकारी आंकड़े के मुताबिक राज्य में 7.5 लाख तेंदूपत्ता तोड़ने वाले मजदूरों में से 6 लाख से भी ज्यादा महिलाएं है. राज्य के प्रधान वनसंरक्षक के.ज्यूड शेखर भी इस बात से सहमत है कि तेंदूपत्ता व्यापार का पूरा श्रेय महिलाओं को ही जाता है.
वे कहते हैं- ‘‘हर साल सरकार पत्ते की कीमत बढ़ाते आ रही है. 2006 में एक गटृठा केरी यानी 20 पत्ते की कीमत 21 पैसे थी, अभी 2011 में इसका मूल्य 35 पैसा हो चुका है.’’
लाखों महिलाओं के कंधे पर टिका करोड़ों का व्यापार है पर फिर भी महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में कोई सुधार नहीं, ये बड़े दुख और शर्म की बात है. करोड़ों का व्यापार, सालाना 200 करोड़ का मुनाफा, लाखों महिलाओं की भागीदारी, आर्थिक हालत फिर भी बद से बदतर. सुभद्रा जैसों की हालत देख कर पूछने का मन करता है कि बीड़ी के हरे पत्तों जैसी चमक क्या ओडीसा की इन औरतों के चेहरे पर भी कभी आयेगी ?
   ये  बड़े अफ़सोस की बात है कि महिलाएं  पूरी मेहनत करने के बावजूद भी अपनी मेहनत का पूरा फल नहीं पाती हैं .आज   देश में मनरेगा को लेकर बड़े बड़े दावे किये जा रहे हैं किन्तु जो योजना १०० दिन में रोजगार की बात करती है वह ८-८ महीने तक काम के पैसे न दे तो उसकी safalta की kaise सम्भावना व्यक्त की जा सकती है .आप सब भी सोचें और बताएं की क्या ''ख़ुशी गोयल जी''jinhone   ये आलेख मुझे बहस हेतु भेजा है क्या सही कह रही हैं ?
  आलेख-ख़ुशी गोयल  
     प्रस्तुति-शालिनी कौशिक

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2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

vidhya ने कहा…

sundar

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